रजनीकांत स्क्रीन पर आएं और दुश्मनों की हवा टाइट न हो, ऐसा भला कैसे हो सकता है! उनका चश्मा लगाने का अंदाज हो, चलने का स्टाइल हो या फिर विलेन को बिना ज्यादा कुछ बोले सबक सिखाने वाला स्वैग, थलाइवा के फैंस के लिए ये सब किसी ट्रीट से कम नहीं है। फिल्म जेलर 2 में भी रजनीकांत का भौकाल बरकरार है। एक्शन है, कॉमेडी है, बड़े सितारों की मौजूदगी है और खूब सारा मसाला भी, लेकिन पिक्चर में एक लोचा है। सितारों की महफिल तो सजती है, मगर कहानी कई बार अपना रास्ता भटक जाती है। यानी टाइगर की दहाड़ सुनाई तो देती है, लेकिन हर बार कहानी में दम नजर नहीं आता। कहानी: टाइगर की वापसी रजनीकांत एक बार फिर टाइगर मुथुवेल पांडियन के अंदाज में नजर आते हैं। इस बार भी मामला अपराध, दुश्मनी, खतरनाक लोगों और परिवार की सुरक्षा के इर्द गिर्द घूमता है। कहानी में ऐसे मोड़ आते हैं, जो टाइगर को फिर एक बार एक्शन मोड में ले आते हैं। एस.जे. सूर्या का किरदार बोधि कलपाक, विद्या बालन का कांथा कलपाक और मिथुन चक्रवर्ती की मौजूदगी कहानी में नए रंग जोड़ती है। फिल्म में कई ऐसे पल हैं, जहां लगता है कि अब कोई बड़ा धमाका होने वाला है। कुछ जगह ये उम्मीद पूरी भी होती है, लेकिन कई बार कहानी एक ही तरह के मसाले को दोबारा परोसने लगती है। फिल्म में एक्शन और स्टार पावर की कमी नहीं है, मगर कहानी को और कसकर बुना जाता तो मजा दोगुना हो सकता था। कुछ घटनाएं जरूरत से ज्यादा सुविधाजनक लगती हैं और कहानी का फ्लो भी बीच बीच में टूटता है। एक्टिंग: थलाइवा का अपना स्वैग रजनीकांत की सबसे बड़ी ताकत उनका स्क्रीन प्रेजेंस है। वह फ्रेम में आते हैं तो नजरें अपने आप उन पर टिक जाती हैं। उनका अंदाज, डायलॉग डिलीवरी और एक्शन करने का स्टाइल आज भी फैंस को सीटियां बजाने का मौका देता है। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका स्टारडम फिल्म का सबसे बड़ा आकर्षण बना रहता है। एस.जे. सूर्या अपने अंदाज से ध्यान खींचते हैं। उनके किरदार में अलग तरह की एनर्जी है और वह रजनीकांत के सामने अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। विद्या बालन और मिथुन चक्रवर्ती जैसे कलाकार फिल्म की स्टार वैल्यू बढ़ाते हैं, हालांकि हर किरदार को बराबर दमदार स्पेस नहीं मिल पाता। कॉमेडी के मोर्चे पर योगी बाबू और बाकी कलाकार कुछ हल्के फुल्के पल देते हैं। फिल्म में सितारों की भरमार है, लेकिन हर एंट्री यादगार बन जाए, ऐसा जरूरी नहीं। कुछ जगह स्टार पावर कहानी से आगे निकलती नजर आती है। डायरेक्शन: मसाला भरपूर, पकड़ कमजोर डायरेक्टर नेल्सन दिलीपकुमार को पता है कि रजनीकांत के स्टारडम को स्क्रीन पर कैसे भुनाना है। हीरो की एंट्री, एक्शन सीक्वेंस और कॉमेडी के बीच तालमेल बैठाने की कोशिश साफ नजर आती है। फिल्म में कुछ ऐसे मोमेंट्स हैं, जो थिएटर में दर्शकों को उत्साहित कर सकते हैं। दिक्कत तब होती है, जब फिल्म अपने ही मसाले को बार बार दोहराने लगती है। पहली फिल्म की सफलता के बाद सीक्वल से उम्मीदें बढ़ जाती हैं, लेकिन सिर्फ बड़े एक्शन और स्टार कैमियो से मजबूत कहानी की कमी पूरी नहीं होती। फिल्म का दूसरा हिस्सा ज्यादा टाइट हो सकता था। कई जगह स्क्रीनप्ले की रफ्तार धीमी पड़ती है और कुछ ट्विस्ट उतना असर नहीं छोड़ते, जितनी उनसे उम्मीद की जाती है। सिनेमैटोग्राफी और टेक्निकल पक्ष विजय कार्तिक कन्नन की सिनेमैटोग्राफी एक्शन और बड़े सेटअप को प्रभावशाली बनाने में मदद करती है। फिल्म का विजुअल ट्रीटमेंट भव्य है और एक्शन सीक्वेंस में जरूरी स्केल नजर आता है। बैकग्राउंड स्कोर भी कई दृश्यों का असर बढ़ाता है। लेकिन करीब पौने तीन घंटे की फिल्म में एडिटिंग की अहमियत और बढ़ जाती है। कुछ हिस्सों को छोटा किया जाता तो कहानी ज्यादा चुस्त लगती। जहां फिल्म को तेजी से आगे बढ़ना चाहिए, वहां वह कभी कभी ठहर जाती है। यही वजह है कि कुछ एक्शन सीक्वेंस दमदार होने के बावजूद पूरी फिल्म का पेस एक जैसा नहीं रहता। म्यूजिक: एंट्री में दम, माहौल में जोश अनिरुद्ध रविचंदर का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के एक्शन और रजनीकांत की एंट्री को वजन देता है। कई दृश्यों में संगीत माहौल को ज्यादा रोमांचक बनाता है और थलाइवा के स्वैग को और बड़ा करता है। हालांकि, संगीत और एक्शन के बीच संतुलन हर जगह एक जैसा नहीं है। कुछ हिस्सों में फिल्म की रफ्तार बनाए रखने की जरूरत ज्यादा महसूस होती है। बैकग्राउंड स्कोर अपना काम करता है, लेकिन कहानी की कमजोरियों को पूरी तरह ढक नहीं पाता। कहां रह गई कमी? जेलर 2 की सबसे बड़ी ताकत रजनीकांत हैं और सबसे बड़ी कमजोरी कहानी का ढीला पड़ता फ्लो। फिल्म में एक्शन, कॉमेडी और बड़े सितारों का तड़का है, लेकिन कुछ घटनाएं जरूरत से ज्यादा खिंची हुई लगती हैं। दूसरे हिस्से में स्क्रीनप्ले की पकड़ कमजोर पड़ती है और क्लाइमैक्स भी उतना दमदार असर नहीं छोड़ता, जितनी उम्मीद बनती है। सीक्वल से पहली फिल्म जैसा जादू दोहराने की उम्मीद रहती है। यहां कुछ पल उस दिशा में जाते हैं, मगर पूरी फिल्म उस स्तर की निरंतरता नहीं बना पाती। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट जेलर 2 रजनीकांत के फैंस के लिए एक बार फिर थलाइवा का स्वैग देखने का मौका है। उनकी एंट्री, एक्शन और कुछ मजेदार पल फिल्म को मनोरंजक बनाते हैं। एस.जे. सूर्या की मौजूदगी भी फिल्म में दिलचस्पी बनाए रखती है। लेकिन कमजोर पड़ता स्क्रीनप्ले, खिंची हुई कहानी और कम असरदार क्लाइमैक्स मजे में रुकावट डालते हैं। कुल मिलाकर, फिल्म में जलवा भी है, सितारों का मेला भी और एक्शन का तड़का भी, लेकिन कहानी हर बार साथ नहीं देती। रजनीकांत के कट्टर फैंस के लिए मसाला मौजूद है, मगर पहली जेलर जैसी बिजली की उम्मीद लेकर जाएंगे तो थोड़ी कमी जरूर महसूस हो सकती है।
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Tag: बरकरर
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मूवी रिव्यू- 'जेलर 2':रजनीकांत का स्वैग बरकरार; एक्शन और सेलेब्स का मेला, कमजोर कहानी और ढीली स्क्रीनप्ले ने मजा किया किरकिरा